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ग़ज़ल
उमैर नजमी
नज़्म
जुगनू
मिरे मकान के आगे है एक चौड़ा सहन वसीअ
कभी वो हँसता नज़र आता है कभी वो उदास
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
नज़्म
वो एक लम्हा हज़ार सदियों के बंधनों से निकल कर आया
वो एक लम्हा जो दस्तरस के वसीअ हल्क़ों से दूर रह कर
आदिल मंसूरी
हास्य
शिकम को कर वसीअ' इतना कि हर पकवान से पहले
तुझे ख़ुद मेज़बाँ पूछे बता तेरी ग़िज़ा क्या है
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
ग़ज़ल
काफ़ी न मोहर-ए-ख़ुम को हुए लुक्का-हा-ए-अब्र
अब इस क़दर वसीअ' ये ख़ुम-ख़ाना हो गया














