सोशल डिस्टेन्सिंग शायरी
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कैसा चमन कि हम से असीरों को मनअ' है
चाक-ए-क़फ़स से बाग़ की दीवार देखना
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ बाग़ सुंदरता और आज़ादी का संकेत है, और पिंजरा कैद का। शायर कहता है कि ज़ुल्म इतना है कि कैदी को बस एक झलक भी नहीं लेने दी जाती। पिंजरे की छोटी-सी दरार, जो उम्मीद का रास्ता हो सकती थी, उसे भी बंद कर दिया गया है। भाव यह है कि पास होते हुए भी आज़ादी और सुंदरता से वंचित कर देना बहुत पीड़ादायक है।
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ बाग़ सुंदरता और आज़ादी का संकेत है, और पिंजरा कैद का। शायर कहता है कि ज़ुल्म इतना है कि कैदी को बस एक झलक भी नहीं लेने दी जाती। पिंजरे की छोटी-सी दरार, जो उम्मीद का रास्ता हो सकती थी, उसे भी बंद कर दिया गया है। भाव यह है कि पास होते हुए भी आज़ादी और सुंदरता से वंचित कर देना बहुत पीड़ादायक है।
अकेला हो रह-ए-दुनिया में गिर चाहे बहुत जीना
हुई है फ़ैज़-ए-तन्हाई से उम्र-ए-ख़िज़्र तूलानी
शहर-ए-जाँ में वबाओं का इक दौर था मैं अदा-ए-तनफ़्फ़ुस में कमज़ोर था
ज़िंदगी फिर मिरी यूँ बचाई गई मेरी शह-रग हटा दी गई या अख़ी