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अज़हर नवाज़

1995 | अलीगढ़, भारत

नौजवान शायरों में शामिल

नौजवान शायरों में शामिल

अज़हर नवाज़

ग़ज़ल 7

अशआर 7

ख़ूबसूरत है सिर्फ़ बाहर से

ये इमारत भी आदमी सी है

किसी बुज़दिल की सूरत घर से ये बाहर निकलता है

मिरा ग़ुस्सा किसी कमज़ोर के ऊपर निकलता है

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कोई किरदार अदा करता है क़ीमत इस की

जब कहानी को नया मोड़ दिया जाता है

जो मेरा झूट है अक्सर मिरे अंदर निकलता है

जिसे कम-तर समझता हूँ वही बेहतर निकलता है

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मोहतरम कह के मुझे उस ने पशेमान किया

कोई पहलू मिला जब मिरी रुस्वाई का

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI