ग़ज़ल 3

 

शेर 4

फिर हुआ ऐसे कि मुझ को दर-ब-दर करने के बा'द

नाम उस बस्ती का मेरे नाम पर रक्खा गया

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कभी दीवार को तरसे कभी दर को तरसे

हम हुए ख़ाना-ब-दोश ऐसे कि घर को तरसे

अदब का ज़ीना मिला ज़ीस्त का क़रीना मिला

कहाँ कहाँ तिरे ग़म से इस्तिफ़ादा हुआ

ज़ेहन इस ख़ौफ़ से होने लगे बंजर कि यहाँ

अच्छी तख़्लीक़ पर कट जाते हैं मेमार के हाथ

पुस्तकें 1

Kulliyat-e-Iqbal Sajid

 

1994

 

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