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ख़्वाज़ा रज़ी हैदर

1946 | कराची, पाकिस्तान

समकालीन पाकिस्तानी शायर

समकालीन पाकिस्तानी शायर

ग़ज़ल 15

शेर 5

गुज़री जो रहगुज़र में उसे दरगुज़र किया

और फिर ये तज़्किरा कभी जा कर घर किया

कब तक बाद-ए-सबा तुझ से तवक़्क़ो रक्खूँ

दिल तमन्ना का शजर है तो हरा हो भी चुका

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नहीं एहसास तुम को राएगानी का हमारी

सुहुलत से तुम्हें शायद मयस्सर हो गए हैं

पुस्तकें 2

Be Dayar Sham

 

1995

मुफ़्ती मोहम्मद रज़ा अंसारी

शख़्सियत और ख़िदमात

1992

 

वीडियो 3

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
चराग़-ए-बज़्म तिरी मंसबी है कितनी देर

ख़्वाज़ा रज़ी हैदर

वक़्त अजीब आ गया मंसब-ओ-जाह के लिए

ख़्वाज़ा रज़ी हैदर

सर-निगूँ दिल की तरह दस्त-ए-दुआ हो भी चुके

ख़्वाज़ा रज़ी हैदर

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