ग़ज़ल 11

शेर 7

नक़्श जब ज़ख़्म बना ज़ख़्म भी नासूर हुआ

जा के तब कोई मसीहाई पे मजबूर हुआ

न-जाने कैसी निगाहों से मौत ने देखा

हुई है नींद से बेदार ज़िंदगी कि मैं हूँ

कभी कभी तो अच्छा-ख़ासा चलते चलते

यूँ लगता है आगे रस्ता कोई नहीं है

आज सोचा है कि ख़ुद रस्ते बनाना सीख लूँ

इस तरह तो उम्र सारी सोचती रह जाऊँगी

जाने फिर मुँह में ज़बाँ रखने का मसरफ़ क्या है

जो कहा चाहते हैं वो तो नहीं कह सकते

क़ितआ 4

 

पुस्तकें 1

गुल-ए-दोपहर

 

2006

 

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