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साइमा इसमा

लाहौर, पाकिस्तान

ग़ज़ल 8

नज़्म 8

शेर 7

आज सोचा है कि ख़ुद रस्ते बनाना सीख लूँ

इस तरह तो उम्र सारी सोचती रह जाऊँगी

न-जाने कैसी निगाहों से मौत ने देखा

हुई है नींद से बेदार ज़िंदगी कि मैं हूँ

कभी कभी तो अच्छा-ख़ासा चलते चलते

यूँ लगता है आगे रस्ता कोई नहीं है

क़ितआ 4

 

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