ग़ज़ल 8

नज़्म 8

शेर 7

न-जाने कैसी निगाहों से मौत ने देखा

हुई है नींद से बेदार ज़िंदगी कि मैं हूँ

नक़्श जब ज़ख़्म बना ज़ख़्म भी नासूर हुआ

जा के तब कोई मसीहाई पे मजबूर हुआ

कभी कभी तो अच्छा-ख़ासा चलते चलते

यूँ लगता है आगे रस्ता कोई नहीं है

क़ितआ 4

 

पुस्तकें 1

गुल-ए-दोपहर

 

2006

 

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