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शहराम सर्मदी

1975 | तजाकिस्तान

ग़ज़ल 26

शेर 3

ब-नाम-ए-इश्क़ इक एहसान सा अभी तक है

वो सादा-लौह हमें चाहता अभी तक है

मिरे अलावा सभी लोग अब ये मानते हैं

ग़लत नहीं थी मिरी राय उस के बारे में

फ़क़त ज़मान मकाँ में ज़रा सा फ़र्क़ आया

जो एक मसअला-ए-दर्द था अभी तक है

 

पुस्तकें 2

Na Mau'ud

 

2014

Rubaiyat-e-Sarmad

 

1994

 

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