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कहानी
चन्द्रकान्त बक्षी
ग़ज़ल
सिपाह-ए-क़ल्ब-शिकन बन गईं सफ़-ए-मिज़्गाँ
तुम ऐसे सफ़दर-ए-ग़ाज़ी हो काँट में है छाँट
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल
मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए
हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
नहीं बे-हिजाब वो चाँद सा कि नज़र का कोई असर न हो
उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो
बशीर बद्र
नज़्म
रक़ीब से!
आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिस ने इस दिल को परी-ख़ाना बना रक्खा था














