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ग़ज़ल
सिपाह-ए-क़ल्ब-शिकन बन गईं सफ़-ए-मिज़्गाँ
तुम ऐसे सफ़दर-ए-ग़ाज़ी हो काँट में है छाँट
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल
मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए
हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
शिकवा
तोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस ने
काट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस ने



