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नज़्म
व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)
उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
ज़िंदगी से डरते हो
फिर भी ये समझते हो हेच आरज़ू-मंदी
ये शब-ए-ज़बाँ-बंदी है रह-ए-ख़ुदा-वंदी
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
सच कहते हैं शैख़ 'अकबर' है ताअत-ए-हक़ लाज़िम
हाँ तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
आवारा
हूक सी सीने में उठ्ठी चोट सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
अमीर ख़ुसरो
शेर
तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
वो सुब्ह कभी तो आएगी
हक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
साहिर लुधियानवी
शेर
इश्क़ का ज़ौक़-ए-नज़ारा मुफ़्त में बदनाम है
हुस्न ख़ुद बे-ताब है जल्वा दिखाने के लिए














