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नज़्म
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
दस्त-अफ़्शाँ चलो मस्त ओ रक़्साँ चलो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
कोई 'आशिक़ किसी महबूबा से!
गुलशन-ए-याद में गर आज दम-ए-बाद-ए-सबा
फिर से चाहे कि गुल-अफ़शाँ हो तो हो जाने दो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
याद-ए-अलीगढ़
कभी बज़्म-ए-अहबाब में शोला-अफ़्शाँ
कभी यूनियन में थे शमशीर-ए-बुर्रां
आबिदुल्लाह ग़ाज़ी
नज़्म
किसान
ख़ार-ओ-ख़स पर एक दर्द-अंगेज़ अफ़्साने की शान
बाम-ए-गर्दूं पर किसी के रूठ कर जाने की शान
जोश मलीहाबादी
नज़्म
अगस्त-1952
ठहरी हुई है शब की सियाही वहीं मगर
कुच कुछ सहर के रंग पर-अफ़्शाँ हुए तो हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
नूरा
लब-ए-लाल-ए-अफ़्शाँ से इक शय चुरा ली
वो शय जिस को अब क्या कहूँ क्या समझिए
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
दिल ओ जिगर में पुर-अफ़्शा जो एक मौजा-ए-ख़ूँ है
हम अपने ज़ोम में समझे हुए थे उस को दम आगे
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
आलम कितने
कितने माथों के अभी सर्द हैं रंगीन गुलाब
गर्द अफ़्शाँ हैं अभी गेसू-ए-पुर-ख़म कितने
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
हमारे डूबने के बाद उभरेंगे नए तारे
जबीन-ए-दहर पर छटकेगी अफ़्शाँ हम नहीं होंगे
अब्दुल मजीद सालिक
नज़्म
आज
और इस मुल्क के बहर-ओ-बर बाम-ओ-दर
अजनबी क़ौम के ज़ुल्मत-अफ़्शाँ फरेरे की मनहूस छाँव से आज़ाद हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
अँधेरी रात का मुसाफ़िर
फ़ज़ा में शोला-अफ़्शाँ देव-ए-इस्तिब्दाद का ख़ंजर
सियासत की सनानें अहल-ए-ज़र के ख़ूँ-चकाँ तेवर
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
कश्मकश
रंग-अफ़्शाँ थी मिरे दिल की ख़लाओं में मगर
एक औरत थी इलाज-ए-ग़म दुनिया तो न थी













