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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
तुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीम
तुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीम
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं
मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं
मजरूह सुल्तानपुरी
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ग़ज़ल
बे-साख़्ता निगाहें जो आपस में मिल गईं
क्या मुँह पर उस ने रख लिए आँखें चुरा के हाथ
निज़ाम रामपुरी
शेर
अजीब लुत्फ़ कुछ आपस की छेड़-छाड़ में है
कहाँ मिलाप में वो बात जो बिगाड़ में है
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
नज़्म
ऐ मेरे सारे लोगो
फिर से ''तू कौन है मैं कौन हूँ'' आपस में सवाल
फिर वही सोच मियान-ए-मन-ओ-तू फैली है
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
चार दिन के लिए दुनिया में लड़ाई कैसी
वो भी क्या लोग हैं आपस में शरर रखते हैं














