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ग़ज़ल
हर रात मचाते फिरें हैं शौक़ से धूमें
ये मस्त-ए-मय-ए-इश्क़ हैं कब ख़ौफ़-ए-असस में
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
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ग़ज़ल
ज़ाहिद हुआ असाम हुआ बरहमन हुआ
इस रह में रहनुमा जो बना राहज़न हुआ
मुंशी बिहारी लाल मुश्ताक़ देहलवी
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात














