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नज़्म
बादा-ए-इश्क़ से सरशार गुरु-नानक थे
रह-ए-तारीक-ए-ज़लालत में पए ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
शम्अ-सा मज़हर-ए-अनवार गुरु-नानक थे
श्याम सुंदर लाल बर्क़
ग़ज़ल
कसवाया जाए घोड़ों से लकड़ी के पहियों का रथ
तब्ल अलम असवार प्यादे सारे बंदोबस्त रहें
अहमद जहाँगीर
ग़ज़ल
दौड़ाती है ये रूह मिरी जिस्म को हर-सू
असवार उड़ाता है ज़माने में फ़रस को
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
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ग़ज़ल
तिल तिरे रखते हैं जागा तीन लक प्यादे की आज
चक तिरे करते हैं दा'वा चार लक असवार का
क़ाज़ी महमूद बेहरी
ग़ज़ल
नहीं बे-हिजाब वो चाँद सा कि नज़र का कोई असर न हो
उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो
बशीर बद्र
ग़ज़ल
हाँ हाँ तिरी सूरत हसीं लेकिन तू ऐसा भी नहीं
इक शख़्स के अशआ'र से शोहरा हुआ क्या क्या तिरा
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
दम-ए-तौफ़ किरमक-ए-शम्अ ने ये कहा कि वो असर-ए-कुहन
न तिरी हिकायत-ए-सोज़ में न मिरी हदीस-ए-गुदाज़ में














