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नज़्म
व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है
सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है
सलीम कौसर
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नज़्म
ख़ुदा का सवाल
तू मेराज-ए-फ़न तू ही फ़न का सिंघार
मुसव्विर हूँ मैं तू मिरा शाहकार
अबरार अहमद काशिफ़
ग़ज़ल
यूँ मेरी याद में महफ़ूज़ हैं तेरे ख़द-ओ-ख़ाल
जिस तरह दिल में किसी शय की तमन्ना होना
अहमद मुश्ताक़
ग़ज़ल
मुझे अपने रूप की धूप दो कि चमक सकें मिरे ख़ाल-ओ-ख़द
मुझे अपने रंग में रंग दो मिरे सारे रंग उतार दो
ऐतबार साजिद
ग़ज़ल
तुझे खो कर भी तुझे पाऊँ जहाँ तक देखूँ
हुस्न-ए-यज़्दाँ से तुझे हुस्न-ए-बुताँ तक देखूँ
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
ख़्वाब जो बिखर गए
मुझे नमक की कान में मिठास की तलाश है
बरहनगी के शहर में लिबास की तलाश है














