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ग़ज़ल
मुझे अपने रूप की धूप दो कि चमक सकें मिरे ख़ाल-ओ-ख़द
मुझे अपने रंग में रंग दो मिरे सारे रंग उतार दो
ऐतबार साजिद
ग़ज़ल
वक़्त ने ज़ेहन में धुँदला दिए तेरे ख़द-ओ-ख़ाल
यूँ तो मैं टूटते तारों का धुआँ तक देखूँ
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
ख़्वाब जो बिखर गए
मिरी नज़र को चाहिए वही चराग़ दूर का
खटक रही है हर किरन नज़र में ख़ार की तरह
आमिर उस्मानी
ग़ज़ल
'सौदा' जो उन ने बाँधा ज़ुल्फ़ों में दिल सज़ा है
शेरों में उस के तू ने क्यूँ ख़त्त-ओ-ख़ाल बाँधे














