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hai.n
हैं ہیں
कलमा-ए-तनबीहा जो किसी काम की मुमानअत या रोकने के लिए आता है नीज़ नापसंदीदगी या ग़ुस्से के इज़हार के लिए भी मुस्तामल
hai.n haa.n
हैं हाँ ہَیں ہاں
हाँ हाँ, टालने या साफ़ जवाब ना देने के लिए मुस्तामल, हूँ हाँ
yuu.n hai.n
यूँ हैं یُوں ہَیں
इसी तरह है, है यही, यही बात है, सही बात ही ये है
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ग़ज़ल
कुल्लो-शयइन यरजिउ के खुल गए मा'नी मुझे
मैं मुसाफ़िर जिस घड़ी मुल्क-ए-बक़ा का हो गया
शाह अकबर दानापुरी
ग़ज़ल
बेदर्द सुननी हो तो चल कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल
आशिक़ तिरा रुस्वा तिरा शाइर तिरा 'इंशा' तिरा
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
शिकवा
शान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों की
कलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों की
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
कोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैं
ढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
शैख़ जो है मस्जिद में नंगा रात को था मय-ख़ाने में
जुब्बा ख़िर्क़ा कुर्ता टोपी मस्ती में इनआ'म किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
सच कहते हैं शैख़ 'अकबर' है ताअत-ए-हक़ लाज़िम
हाँ तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ पल दो पल मिरी कहानी है
पल दो पल मेरी हस्ती है पल दो पल मिरी जवानी है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
फ़र्ज़ करो
शाइ'र भी जो मीठी बानी बोल के मन को हरते हैं
बंजारे जो ऊँचे दामों जी के सौदे करते हैं
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
वो दिल जो मैं ने माँगा था मगर ग़ैरों ने पाया है
बड़ी शय है अगर उस की पशेमानी मुझे दे दो










