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ग़ज़ल
शरह-ए-ग़म तो मुख़्तसर होती गई उस के हुज़ूर
लफ़्ज़ जो मुँह से न निकला दास्ताँ बनता गया
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
अब जो कोई पूछे भी तो उस से क्या शरह-ए-हालात करें
दिल ठहरे तो दर्द सुनाएँ दर्द थमे तो बात करें
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
उर्दू का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले
उर्दू का ग़म-ए-मर्ग सुबुक भी है गराँ भी
है शामिल-ए-अर्बाब-ए-अ'ज़ा शाह-ए-जहाँ भी
रईस अमरोहवी
ग़ज़ल
तिरा लुत्फ़ वजह-ए-तस्कीं न क़रार शरह-ए-ग़म से
कि हैं दिल में वो गिले भी जो मलाल तक न पहुँचे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
शरह-ए-फ़िराक़ मदह-ए-लब-ए-मुश्कबू करें
ग़ुर्बत-कदे में किस से तिरी गुफ़्तुगू करें
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
निगाह ओ दिल से अब तफ़सीर-ओ-शरह-ए-आरज़ू होगी
ज़बान ओ लब से तर्क-ए-इल्तिजा करने का वक़्त आया














