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ग़ज़ल
न मैं लाग हूँ न लगाव हूँ न सुहाग हूँ न सुभाव हूँ
जो बिगड़ गया वो बनाव हूँ जो नहीं रहा वो सिंगार हूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
नज़्म
किस से मोहब्बत है
जवानी है सुहाग उस का तबस्सुम उस का गहना है
नहीं आलूदा-ए-ज़ुल्मत सहर-दामानियाँ उस की
असरार-उल-हक़ मजाज़
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suhaag
सुहाग سُہاگ
किसी स्त्री के जीवन की वह कालावधि जिसमें उसका पति जीवित हो, सुहागिन होने की अवस्था, सधवा-अवस्था, सधवा या विवाहित होने की निशानी, सौभाग्य, अहिवात, पति, मिलाप, दूल्हा दुल्हन का पहली रात साथ सोना, वह वस्त्र जो वर विवाह के समय जो विवाह के समय पहना जाता है, एक इत्र का नाम जो प्रायः शादी-बियाह लगाया जाता है और प्रायः लाल रंग का होता है, एक राग का नाम जो आनंद प्रकट करने के लिए गाया जाता है, शादी ब्याह के एक गीत की क़सम जो दूल्हा वाले गाते हैं, शादी ब्याह के गीत, ख़ुशी के गीत, मुहब्बत, लाड प्यार, प्यार भरी बातें, सुंदरता, खूबसूरती, जुबान, श्रृंगार, सजावट, बनाव सिंगार, तेज, विलासिता, सुख, लाड, प्यार, मोहब्बत, प्यार भारी भातें, धन्य, धन्य होना
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नज़्म
हिण्डोला
ठुमक ठुमक के चले थे घरों के आँगन में
'अनीस' ओ 'हाली' ओ 'इक़बाल' और 'वारिस-शाह'
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
न सुहाग-रात चमक सकी यूँही कसमसाते सहर हुई
कोई दीप गुम-शुदा थालियों में जलाना हो कहीं यूँ न हो
साबिर ज़फ़र
नज़्म
आधी रात
तमोलियों की दूकानें कहीं कहीं हैं खुली
कुछ ऊँघती हुई बढ़ती हैं शाह-राहों पर
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
शाम-ए-अयादत
मुझे जगा रहा है मौत की ग़ुनूदगी से कौन
निगाहों में सुहाग-रात का समाँ लिए हुए
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
ख़ाक-ए-दिल
दफ़्न है देख मिरी रूह-ए-गुलिस्ताँ तुझ में
मेरी गुल-पोश जवाँ-साल उमंगों का सुहाग
जाँ निसार अख़्तर
हास्य
वो सुहाग-रात जहेज़ में सग-ए-पालतू भी ले आई थी
जो सहर हुई तो पता चला यहाँ तीसरा कोई और है
खालिद इरफ़ान
नज़्म
जुदाई
किरन सुहाग की बिंदी की लहलहाई हुई
वो अँखड़ियों का फ़ुसूँ रूप की वो देविय्यत
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
बेवा की फ़रियाद
ग़ज़ब ये है शबाब में मिरा सुहाग लुट गया
सफ़र में था जो हम-सफ़र उसी का साथ छुट गया
अर्श मलसियानी
नज़्म
रहगुज़र
वो तबस्सुम जिस को रोते हैं कई उजड़े सुहाग
बन रहा है इक लचकता ख़ार अपने पाँव में
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
बह गए वक़्त के सैलाब में जिस्मों के सुहाग
अब न वो चश्म न रुख़्सार न लब कुछ भी नहीं














