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आतिफ़ वहीद यासिर

1985 - | लाहौर, पाकिस्तान

शेर 4

किस के बदन की नर्मियाँ हाथों को गुदगुदा गईं

दश्त-ए-फ़िराक़-ए-यार को पहलू-ए-यार कर दिया

मिरी राख में थीं कहीं कहीं मेरे एक ख़्वाब की किर्चियाँ

मेरे जिस्म-ओ-जाँ में छुपा हुआ तिरी क़ुर्बतों का ख़याल था

रहज़नों के हाथ सारा इंतिज़ाम आया तो क्या

फिर वफ़ा के मुजरिमों में मेरा नाम आया तो क्या

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