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अहमद राही

1923 - 2002 | लाहौर, पाकिस्तान

शायर, गीतकार, संस्थापक संपादक त्रैमासिक '' सवेरा ''

शायर, गीतकार, संस्थापक संपादक त्रैमासिक '' सवेरा ''

अहमद राही

ग़ज़ल 25

नज़्म 11

अशआर 17

हर एक बात के यूँ तो दिए जवाब उस ने

जो ख़ास बात थी हर बार हँस के टाल गया

मैं तो मस्जिद से चला था किसी काबा की तरफ़

दुख तो ये है कि इबादत मिरी बद-नाम हुई

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कहीं ये अपनी मोहब्बत की इंतिहा तो नहीं

बहुत दिनों से तिरी याद भी नहीं आई

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मिरे हबीब मिरी मुस्कुराहटों पे जा

ख़ुदा-गवाह मुझे आज भी तिरा ग़म है

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ख़ुश्क ख़ुश्क सी पलकें और सूख जाती हैं

मैं तिरी जुदाई में इस तरह भी रोता हूँ

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क़ितआ 1

 

पुस्तकें 8

 

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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