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अली इफ़्तिख़ार ज़ाफ़री

1969 | लाहौर, पाकिस्तान

ग़ज़ल 4

 

शेर 4

नींद आती है मगर जाग रहा हूँ सर-ए-ख़्वाब

आँख लगती है तो ये उम्र गुज़र जानी है

किसी की आँख का तारा हुआ करते थे हम भी तो

अचानक शाम का तारा नज़र आया तो याद आया

अव्वलीं चाल से आगे नहीं सोचा मैं ने

ज़ीस्त शतरंज की बाज़ी थी सो मैं हार गया

तुम किसी संग पे अब सर को टिका कर सो जाओ

कौन सुनता है शब-ए-ग़म का फ़साना सर-ए-राह

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