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असग़र मेहदी होश

जौनपुर, भारत

ना’त, मन्क़बत, सलाम, मर्सिये और क़सीदे जैसी विधाओं में शायरी की

ना’त, मन्क़बत, सलाम, मर्सिये और क़सीदे जैसी विधाओं में शायरी की

असग़र मेहदी होश

ग़ज़ल 18

नज़्म 7

अशआर 18

ख़ुदा बदल सका आदमी को आज भी 'होश'

और अब तक आदमी ने सैकड़ों ख़ुदा बदले

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दीवार उन के घर की मिरी धूप ले गई

ये बात भूलने में ज़माना लगा मुझे

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ज़िक्र-ए-अस्लाफ़ से बेहतर है कि ख़ामोश रहें

कल नई नस्ल में हम लोग भी बूढ़े होंगे

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टूट कर रूह में शीशों की तरह चुभते हैं

फिर भी हर आदमी ख़्वाबों का तमन्नाई है

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हम भी करते रहें तक़ाज़ा रोज़

तुम भी कहते रहो कि आज नहीं

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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