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फ़े सीन एजाज़

1948 | कोलकाता, भारत

फ़े सीन एजाज़

ग़ज़ल 28

नज़्म 10

अशआर 12

अच्छी-ख़ासी रुस्वाई का सबब होती है

दूसरी औरत पहली जैसी कब होती है

मिल रही है मुझे ना-कर्दा गुनाहों की सज़ा

मेरे मालिक मिरे सज्दे मुझे वापस कर दे

हज़ारों साल की थी आग मुझ में

रगड़ने तक मैं इक पत्थर रहा था

अब के रूठे तो मनाने नहीं आया कोई

बात बढ़ जाए तो हो जाती है कम आप ही आप

तुझ को मंज़ूर नहीं मुझ को है अब भी मंज़ूर

मेरी क़ुर्बत मिरे बोसे मुझे वापस कर दे

रुबाई 6

लेख 1

 

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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