Jigar Moradabadi's Photo'

जिगर मुरादाबादी

1890 - 1960 | मुरादाबाद, भारत

सबसे प्रमुख पूर्वाधुनिक शायरों में शामिल अत्याधिक लोकप्रियता के लिए विख्यात

सबसे प्रमुख पूर्वाधुनिक शायरों में शामिल अत्याधिक लोकप्रियता के लिए विख्यात

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं

हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं

हम ने सीने से लगाया दिल अपना बन सका

मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

जो तूफ़ानों में पलते जा रहे हैं

वही दुनिया बदलते जा रहे हैं

उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें

मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे

अपना ज़माना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल

हम वो नहीं कि जिन को ज़माना बना गया

तेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं

हाँ मुझी को ख़राब होना था

तिरे जमाल की तस्वीर खींच दूँ लेकिन

ज़बाँ में आँख नहीं आँख में ज़बान नहीं

इश्क़ जब तक कर चुके रुस्वा

आदमी काम का नहीं होता

till love does not cause him disgrace

in this world man has no place

till love does not cause him disgrace

in this world man has no place

मिरी ज़िंदगी तो गुज़री तिरे हिज्र के सहारे

मिरी मौत को भी प्यारे कोई चाहिए बहाना

यूँ ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बग़ैर

जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं

इब्तिदा वो थी कि जीना था मोहब्बत में मुहाल

इंतिहा ये है कि अब मरना भी मुश्किल हो गया

दोनों हाथों से लूटती है हमें

कितनी ज़ालिम है तेरी अंगड़ाई

हमीं जब होंगे तो क्या रंग-ए-महफ़िल

किसे देख कर आप शरमाइएगा

सदाक़त हो तो दिल सीनों से खिंचने लगते हैं वाइ'ज़

हक़ीक़त ख़ुद को मनवा लेती है मानी नहीं जाती

उस ने अपना बना के छोड़ दिया

क्या असीरी है क्या रिहाई है

मोहब्बत में इक ऐसा वक़्त भी दिल पर गुज़रता है

कि आँसू ख़ुश्क हो जाते हैं तुग़्यानी नहीं जाती

दिल को सुकून रूह को आराम गया

मौत गई कि दोस्त का पैग़ाम गया

ले के ख़त उन का किया ज़ब्त बहुत कुछ लेकिन

थरथराते हुए हाथों ने भरम खोल दिया

जहल-ए-ख़िरद ने दिन ये दिखाए

घट गए इंसाँ बढ़ गए साए