हौसला शायरी

शायरी की दुनिया अनंत है । किसी एक विषय से ज़्यादा जीवन ही शायरी और साहित्य का विषय है । इश्क़-ओ-आश्क़ी की बात हो या हमारे जीवन का का कोई और विमर्श, शायरी इन सब से संवाद करती है । हौसला और प्रेरणा भी शायरी का एक मुख्य विषय है । असल में शायरी जीवन के हर रंग से संवाद करते हुए अपना रोल अदा करती है । अब कुछ कर जाने की क्षमता हो या किसी ख़ास अवसर पर बहादुरी के जज़्बे की बात हो शायरी अपना रोल अदा करती है ।यहाँ प्रस्तुत शायरी में आप महसूस करेंगे कि ये शायरी हमें दर्द ,दुख और जीवन की अनिश्चितताओं का सामना करने की ताक़त देती है ।

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं

हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं

जिगर मुरादाबादी

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं

अल्लामा इक़बाल

हज़ार बर्क़ गिरे लाख आँधियाँ उट्ठें

वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं

साहिर लुधियानवी

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे

जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे

We will nourish the pen and tablet; we will tend them ever

We will write what the heart suffers; we will defend them ever

We will nourish the pen and tablet; we will tend them ever

We will write what the heart suffers; we will defend them ever

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जो तूफ़ानों में पलते जा रहे हैं

वही दुनिया बदलते जा रहे हैं

जिगर मुरादाबादी

वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे आसमाँ

हम अभी से क्यूँ बताएँ क्या हमारे दिल में है

बिस्मिल अज़ीमाबादी

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

बिस्मिल अज़ीमाबादी

अभी से पाँव के छाले देखो

अभी यारो सफ़र की इब्तिदा है

एजाज़ रहमानी

अब हवाएँ ही करेंगी रौशनी का फ़ैसला

जिस दिए में जान होगी वो दिया रह जाएगा

the winds will now decide what happens to the light

those lamps that have the strength, will survive the night

the winds will now decide what happens to the light

those lamps that have the strength, will survive the night

महशर बदायुनी

नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर

तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में

अल्लामा इक़बाल

अपना ज़माना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल

हम वो नहीं कि जिन को ज़माना बना गया

जिगर मुरादाबादी

लोग कहते हैं बदलता है ज़माना सब को

मर्द वो हैं जो ज़माने को बदल देते हैं

अकबर इलाहाबादी

ये कह के दिल ने मिरे हौसले बढ़ाए हैं

ग़मों की धूप के आगे ख़ुशी के साए हैं

माहिर-उल क़ादरी

साहिल के सुकूँ से किसे इंकार है लेकिन

तूफ़ान से लड़ने में मज़ा और ही कुछ है

आल-ए-अहमद सूरूर

तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा कर

सरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर

अमीर मीनाई

बढ़ के तूफ़ान को आग़ोश में ले ले अपनी

डूबने वाले तिरे हाथ से साहिल तो गया

अब्दुल हमीद अदम

भँवर से लड़ो तुंद लहरों से उलझो

कहाँ तक चलोगे किनारे किनारे

रज़ा हमदानी

लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं

मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है

अमीर क़ज़लबाश

शह-ज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़

वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले

मिर्ज़ा अज़ीम बेग 'अज़ीम'

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

दुष्यंत कुमार

हार हो जाती है जब मान लिया जाता है

जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है

शकील आज़मी

यक़ीन हो तो कोई रास्ता निकलता है

हवा की ओट भी ले कर चराग़ जलता है

मंज़ूर हाशमी

देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार

रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर देख

मजरूह सुल्तानपुरी

जलाने वाले जलाते ही हैं चराग़ आख़िर

ये क्या कहा कि हवा तेज़ है ज़माने की

जमील मज़हरी

जहाँ पहुँच के क़दम डगमगाए हैं सब के

उसी मक़ाम से अब अपना रास्ता होगा

आबिद अदीब

इन्ही ग़म की घटाओं से ख़ुशी का चाँद निकलेगा

अँधेरी रात के पर्दे में दिन की रौशनी भी है

अख़्तर शीरानी

सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का

यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का

शहरयार

आईन-ए-जवाँ-मर्दां हक़-गोई बे-बाकी

अल्लाह के शेरों को आती नहीं रूबाही

अल्लामा इक़बाल

मेरे टूटे हौसले के पर निकलते देख कर

उस ने दीवारों को अपनी और ऊँचा कर दिया

आदिल मंसूरी

वक़्त की गर्दिशों का ग़म करो

हौसले मुश्किलों में पलते हैं

महफूजुर्रहमान आदिल

उसे गुमाँ है कि मेरी उड़ान कुछ कम है

मुझे यक़ीं है कि ये आसमान कुछ कम है

नफ़स अम्बालवी

वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से

वो और थे जो हार गए आसमान से

फ़हीम जोगापुरी

मैं आँधियों के पास तलाश-ए-सबा में हूँ

तुम मुझ से पूछते हो मिरा हौसला है क्या

अदा जाफ़री

इतने मायूस तो हालात नहीं

लोग किस वास्ते घबराए हैं

जाँ निसार अख़्तर

मौजों की सियासत से मायूस हो 'फ़ानी'

गिर्दाब की हर तह में साहिल नज़र आता है

फ़ानी बदायुनी

दामन झटक के वादी-ए-ग़म से गुज़र गया

उठ उठ के देखती रही गर्द-ए-सफ़र मुझे

अली सरदार जाफ़री

गो आबले हैं पाँव में फिर भी रहरवो

मंज़िल की जुस्तुजू है तो जारी रहे सफ़र

नूर क़ुरैशी

सदा एक ही रुख़ नहीं नाव चलती

चलो तुम उधर को हवा हो जिधर की

अल्ताफ़ हुसैन हाली

मुसीबत का पहाड़ आख़िर किसी दिन कट ही जाएगा

मुझे सर मार कर तेशे से मर जाना नहीं आता

यगाना चंगेज़ी

हवा ख़फ़ा थी मगर इतनी संग-दिल भी थी

हमीं को शम्अ जलाने का हौसला हुआ

क़ैसर-उल जाफ़री

लज़्ज़त-ए-ग़म तो बख़्श दी उस ने

हौसले भी 'अदम' दिए होते

अब्दुल हमीद अदम

जिन हौसलों से मेरा जुनूँ मुतमइन था

वो हौसले ज़माने के मेयार हो गए

अली जव्वाद ज़ैदी

तुंदी-ए-बाद-ए-मुख़ालिफ़ से घबरा उक़ाब

ये तो चलती है तुझे ऊँचा उड़ाने के लिए

सय्यद सादिक़ हुसैन

बना लेता है मौज-ए-ख़ून-ए-दिल से इक चमन अपना

वो पाबंद-ए-क़फ़स जो फ़ितरतन आज़ाद होता है

असग़र गोंडवी