हिज्र शायरी

अगर आप हिज्र की हालत में हैं तो ये शायरी आप के लिए ख़ास है। इस शायरी को पढ़ते हुए हिज्र की पीड़ा एक मज़ेदार तजुर्बे में बदलने लगेगी। ये शायरी पढ़िए, हिज्र और हिज्र ज़दा दिलों का तमाशा देखिए।

कि तुझ बिन इस तरह दोस्त घबराता हूँ मैं

जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं

जिगर मुरादाबादी

आई होगी किसी को हिज्र में मौत

मुझ को तो नींद भी नहीं आती

अकबर इलाहाबादी

आज जाने राज़ ये क्या है

हिज्र की रात और इतनी रौशन

जिगर मुरादाबादी

अब की होली में रहा बे-कार रंग

और ही लाया फ़िराक़-ए-यार रंग

इमाम बख़्श नासिख़

अब तिरे हिज्र में यूँ उम्र बसर होती है

शाम होती है तो रो रो के सहर होती है

अनवापुल हसन अनवार

अम्न था प्यार था मोहब्बत था

रंग था नूर था नवा था फ़िराक़

हबीब जालिब

बदन में जैसे लहू ताज़ियाना हो गया है

उसे गले से लगाए ज़माना हो गया है

इरफ़ान सिद्दीक़ी

बड़ी तवील है 'महशर' किसी के हिज्र की बात

कोई ग़ज़ल ही सुनाओ कि नींद जाए

महशर इनायती

बहुत दिनों में मोहब्बत को ये हुआ मा'लूम

जो तेरे हिज्र में गुज़री वो रात रात हुई

फ़िराक़ गोरखपुरी

ब-पास-ए-दिल जिसे अपने लबों से भी छुपाया था

मिरा वो राज़ तेरे हिज्र ने पहुँचा दिया सब तक

क़तील शिफ़ाई

ब-ज़ाहिर एक ही शब है फ़िराक़-ए-यार मगर

कोई गुज़ारने बैठे तो उम्र सारी लगे

अहमद फ़राज़

चूँ शम-ए-सोज़ाँ चूँ ज़र्रा हैराँ ज़े मेहर-ए-आँ-मह बगश्तम आख़िर

नींद नैनाँ अंग चैनाँ आप आवे भेजे पतियाँ

अमीर ख़ुसरो

डर गया है जी कुछ ऐसा हिज्र से

तुम जो पहलू से उठे दिल हिल गया

जलील मानिकपूरी

देख कर तूल-ए-शब-ए-हिज्र दुआ करता हूँ

वस्ल के रोज़ से भी उम्र मिरी कम हो जाए

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

देख ले बुलबुल परवाना की बेताबी को

हिज्र अच्छा हसीनों का विसाल अच्छा है

अमीर मीनाई

देख क़ासिद को मिरे यार ने पूछा 'ताबाँ'

क्या मिरे हिज्र में जीता है वो ग़मनाक हनूज़

ताबाँ अब्दुल हई

दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो

इस बात से हम को क्या मतलब ये कैसे हो ये क्यूँकर हो

इब्न-ए-इंशा

दो अलग लफ़्ज़ नहीं हिज्र विसाल

एक में एक की गोयाई है

फ़रहत एहसास

दो घड़ी उस से रहो दूर तो यूँ लगता है

जिस तरह साया-ए-दीवार से दीवार जुदा

अहमद फ़राज़

इक टीस जिगर में उठती है इक दर्द सा दिल में होता है

हम रात को रोया करते हैं जब सारा आलम सोता है

ज़िया अज़ीमाबादी

इक उम्र कट गई है तिरे इंतिज़ार में

ऐसे भी हैं कि कट सकी जिन से एक रात

फ़िराक़ गोरखपुरी

'फ़राज़' इश्क़ की दुनिया तो ख़ूब-सूरत थी

ये किस ने फ़ित्ना-ए-हिज्र-ओ-विसाल रक्खा है

अहमद फ़राज़

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा

कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया उधर रक्खा

अमीर मीनाई

गुज़र तो जाएगी तेरे बग़ैर भी लेकिन

बहुत उदास बहुत बे-क़रार गुज़रेगी

अज्ञात

हर इश्क़ के मंज़र में था इक हिज्र का मंज़र

इक वस्ल का मंज़र किसी मंज़र में नहीं था

अक़ील अब्बास जाफ़री

हिज्र इक वक़्फ़ा-ए-बेदार है दो नींदों में

वस्ल इक ख़्वाब है जिस की कोई ताबीर नहीं

अहमद मुश्ताक़

हिज्र की रात काटने वाले

क्या करेगा अगर सहर हुई

अज़ीज़ लखनवी

हिज्र की रात ये हर डूबते तारे ने कहा

हम कहते थे आएँगे वो आए तो नहीं

अली जव्वाद ज़ैदी

हिज्र की शब नाला-ए-दिल वो सदा देने लगे

सुनने वाले रात कटने की दुआ देने लगे

साक़िब लखनवी

हिज्र में इतना ख़सारा तो नहीं हो सकता

एक ही इश्क़ दोबारा तो नहीं हो सकता

अफ़ज़ल गौहर राव

हिज्र में मिलने शब-ए-माह के ग़म आए हैं

चारासाज़ों को भी बुलवाओ कि कुछ रात कटे

मख़दूम मुहिउद्दीन

हिज्र में मुस्कुराए जा दिल में उसे तलाश कर

नाज़-ए-सितम उठाए जा राज़-ए-सितम फ़ाश कर

फ़ानी बदायुनी

हिज्र में मुज़्तरिब सा हो हो के

चार-सू देखता हूँ रो रो के

जुरअत क़लंदर बख़्श

हिज्र विसाल चराग़ हैं दोनों तन्हाई के ताक़ों में

अक्सर दोनों गुल रहते हैं और जला करता हूँ मैं

फ़रहत एहसास

हम कहाँ और तुम कहाँ जानाँ

हैं कई हिज्र दरमियाँ जानाँ

जौन एलिया

इश्क़ में निस्बत नहीं बुलबुल को परवाने के साथ

वस्ल में वो जान दे ये हिज्र में जीती रहे

जाफ़र अली खां ज़की

इश्क़ पर फ़ाएज़ हूँ औरों की तरह लेकिन मुझे

वस्ल का लपका नहीं है हिज्र से वहशत नहीं

ग़ुलाम हुसैन साजिद

जागता हूँ मैं एक अकेला दुनिया सोती है

कितनी वहशत हिज्र की लम्बी रात में होती है

शहरयार

जो बात हिज्र की आती तो अपने दामन से

वो आँसू पोंछता जाता था और मैं रोता था

नज़ीर अकबराबादी

जो ग़ज़ल आज तिरे हिज्र में लिक्खी है वो कल

क्या ख़बर अहल-ए-मोहब्बत का तराना बन जाए

अहमद फ़राज़

जुदाई की रुतों में सूरतें धुँदलाने लगती हैं

सो ऐसे मौसमों में आइना देखा नहीं करते

हसन अब्बास रज़ा

कब ठहरेगा दर्द दिल कब रात बसर होगी

सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कड़ा है दिन बड़ी है रात जब से तुम नहीं आए

दिगर-गूँ हैं मिरे हालात जब से तुम नहीं आए

अनवर शऊर

कह दो ये कोहकन से कि मरना नहीं कमाल

मर मर के हिज्र-ए-यार में जीना कमाल है

जलील मानिकपूरी

काव काव-ए-सख़्त-जानी हाए-तन्हाई पूछ

सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का

What constant pain this loneliness you may not believe

Like from mountains drawing milk, is passing morn to eve

What constant pain this loneliness you may not believe

Like from mountains drawing milk, is passing morn to eve

मिर्ज़ा ग़ालिब

ख़ैर से दिल को तिरी याद से कुछ काम तो है

वस्ल की शब सही हिज्र का हंगाम तो है

हसन नईम

ख़ुद चले आओ या बुला भेजो

रात अकेले बसर नहीं होती

अज़ीज़ लखनवी

ख़ुदा करे कि तिरी उम्र में गिने जाएँ

वो दिन जो हम ने तिरे हिज्र में गुज़ारे थे

अहमद नदीम क़ासमी

किसी के हिज्र में जीना मुहाल हो गया है

किसे बताएँ हमारा जो हाल हो गया है

अजमल सिराज

कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ

फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते

अहमद फ़राज़

Added to your favorites

Removed from your favorites