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मीर सोज़

1721 - 1798 | दिल्ली, भारत

मीर सोज़

ग़ज़ल 17

अशआर 7

जिस का तुझ सा हबीब होवेगा

कौन उस का रक़ीब होवेगा

सर ज़ानू पे हो उस के और जान निकल जाए

मरना तो मुसल्लम है अरमान निकल जाए

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उन से और मुझ से यही शर्त-ए-वफ़ा ठहरी है

वो सितम ढाएँ मगर उन को सितम-गर कहूँ

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रुस्वा हुआ ख़राब हुआ मुब्तला हुआ

वो कौन सी घड़ी थी कि तुझ से जुदा हुआ

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अहल-ए-ईमाँ 'सोज़' को कहते हैं काफ़िर हो गया

आह या रब राज़-ए-दिल इन पर भी ज़ाहिर हो गया

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पुस्तकें 7

 

ऑडियो 10

अगर मैं जानता है इश्क़ में धड़का जुदाई का

अपने नाले में गर असर होता

जितना कोई तुझ से यार होगा

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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