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मिर्ज़ा इहसान बेग

आज़मगढ़, भारत

शेर 3

कुछ नहीं इख़्तियार में फिर भी

हर ख़ता मेरी हर क़ुसूर मिरा

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उस आस्ताँ पे सज्दा का भी कुछ रहा होश

अल्लाह-रे इज़्तिराब जबीन-ए-नियाज़ का

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बहुत लतीफ़ हैं कैफ़िय्यतें मोहब्बत की

वो बुल-हवस है जो करता है जैब दामन चाक

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