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शहाब जाफ़री

1930 - 2000 | दिल्ली, भारत

शहाब जाफ़री

ग़ज़ल 15

नज़्म 8

अशआर 4

चले तो पाँव के नीचे कुचल गई कोई शय

नशे की झोंक में देखा नहीं कि दुनिया है

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तू इधर उधर की बात कर ये बता कि क़ाफ़िला क्यूँ लुटा

मुझे रहज़नों से गिला नहीं तिरी रहबरी का सवाल है

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पाँव जब सिमटे तो रस्ते भी हुए तकिया-नशीं

बोरिया जब तह किया दुनिया उठा कर ले गए

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क़लंदरी मिरी पूछो हो दोस्तान-ए-जुनूँ

हर आस्ताँ मिरी ठोकर से जाना जाता है

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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