ग़ज़ल 18

शेर 13

हम दुनिया से जब तंग आया करते हैं

अपने साथ इक शाम मनाया करते हैं

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सफ़र में होती है पहचान कौन कैसा है

ये आरज़ू थी मिरे साथ तू सफ़र करता

मिरी तवज्जोह फ़क़त मिरे काम पर रहेगी

मैं ख़ुद को साबित करूँगा दावा नहीं करूँगा

मैं ने बख़्श दी तिरी क्यूँ ख़ता तुझे इल्म है

तुझे दी है कितनी कड़ी सज़ा तुझे इल्म है

फिर जो करने लगा है तू व'अदा

क्या मुकरने का फिर इरादा है

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