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वाजिद अली शाह अख़्तर

1823 - 1887 | लखनऊ, भारत

अवध के आखि़री नवाब/भारतीय संगीत, नृत्य, नाटक के संरक्षक

अवध के आखि़री नवाब/भारतीय संगीत, नृत्य, नाटक के संरक्षक

वाजिद अली शाह अख़्तर

ग़ज़ल 24

अशआर 12

यही तशवीश शब-ओ-रोज़ है बंगाले में

लखनऊ फिर कभी दिखलाए मुक़द्दर मेरा

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उल्फ़त ने तिरी हम को तो रक्खा कहीं का

दरिया का जंगल का समा का ज़मीं का

दर-ओ-दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं

ख़ुश रहो अहल-ए-वतन हम तो सफ़र करते हैं

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बे-मुरव्वत हो बेवफ़ा हो तुम

अपने मतलब के आश्ना हो तुम

कमर धोका दहन उक़्दा ग़ज़ाल आँखें परी चेहरा

शिकम हीरा बदन ख़ुशबू जबीं दरिया ज़बाँ ईसा

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पुस्तकें 43

ऑडियो 5

उल्फ़त ने तिरी हम को तो रक्खा न कहीं का

ग़ुंचा-ए-दिल खिले जो चाहो तुम

गर्मियाँ शोख़ियाँ किस शान से हम देखते हैं

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