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नज़्म
उर्दू का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले
मिटने को है अस्लाफ़ की 'अज़्मत का निशाँ भी
ये मय्यत-ए-ग़म देहली-ए-मरहूम से निकले
रईस अमरोहवी
नज़्म
दोस्ती का हाथ
ज़मीन-ए-पाक हमारे जिगर का टुकड़ा है
हमें अज़ीज़ है देहली ओ लखनऊ की तरह
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़
न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
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नज़्म
ईस्ट इंडिया कंपनी के फ़रज़ंदों से ख़िताब
हिजरत-ए-सुल्तान-ए-देहली का समाँ भी याद है
शेर-दिल 'टीपू' की ख़ूनीं दास्ताँ भी याद है
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
था 'ज़ौक़' पहले देहली में पंजाब का सा हुस्न
पर अब वो पानी कहते हैं मुल्तान बह गया
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
बहादुर शाह ज़फ़र
नज़्म
भारत के मुसलमान
हर ज़र्रा-ए-देहली है तिरे ज़ौ से मुनव्वर
पंजाब की मस्ती असर-ए-जज़्ब-ए-क़लंदर
जगन्नाथ आज़ाद
ग़ज़ल
कू ज़मज़मा-ए-देहली व कू लहजा-ए-पूरब
क्यूँ उस की तरफ़ होते हो नाहक़ को रज़ालो
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
मर्सिया-ए-देहली-ए-मरहूम
तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़
न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
दरबार1911
देख आए हम भी दो दिन रह के देहली की बहार
हुक्म-ए-हाकिम से हुआ था इजतिमा-ए-इंतिशार
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा ग़ालिब
अकबराबाद में पैदा हुए देहली में रहे












