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नज़्म
रात सुनसान है
मेरी तन्हाई के एहसास को ज़ाइल करने
जिस की दीवारें मिरे पास चली आती हैं
मुस्तफ़ा ज़ैदी
ग़ज़ल
इंतिज़ार उस गुल का इस दर्जा किया गुलज़ार में
नूर आख़िर दीदा-ए-नर्गिस का ज़ाइल हो गया
अबुल कलाम आज़ाद
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ग़ज़ल
'शकील' उन की जुदाई में है लुत्फ़-ए-ज़िंदगी ज़ाइल
नज़र बे-कैफ़ अफ़्सुर्दा तबीअ'त होती जाती है
शकील बदायूनी
नज़्म
भारत के सपूतों से ख़िताब
जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को
इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ
लाल चन्द फ़लक
ग़ज़ल
असर अब और क्या होना था उस जान-ए-तग़ाफ़ुल पर
जो पहले बेश ओ कम था वो भी ज़ाइल होने वाला है
ज़फ़र इक़बाल
शेर
जेल से वापस आ कर उस ने पांचों वक़्त नमाज़ पढ़ी
मुँह भी बंद हुए सब के और बदनामी भी ख़त्म हुई
ताहिर फ़राज़
उद्धरण
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
ग़ज़ल
मोहब्बत में तिरी अपनी ज़बाँ को सी लिया मैं ने
असर ज़ाइल न हो जाए तिरी जादू-बयानी का
ख़ुर्शीद तलब
ग़ज़ल
नहीं मुमकिन कि हम से ज़ुल्मत-ए-इमकान ज़ाइल हो
छुड़ा दे आह कोई क्यूँ के ज़ंगी से सियाही को














