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नज़्म
ताज-महल
सब्त जिस राह में हों सतवत-ए-शाही के निशाँ
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मअ'नी
साहिर लुधियानवी
शायरी के अनुवाद
आज मैं ने अपने घर का नंबर मिटा दिया है
और गुल की पेशानी पर सब्त गुल का नाम हटा दिया है
अमृता प्रीतम
नज़्म
अपनी मल्का-ए-सुख़न से
इन सब के इम्तिज़ाज से पैदा हुई है तू
कितने हसीं उफ़ुक़ से हुवैदा हुई है तू
जोश मलीहाबादी
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ई-पुस्तक
संत वाणी
संत वाणी
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नज़्म
ख़ातून-ए-मशरिक़
नेमतें सब बट चुकीं लेकिन न होना मुज़्महिल
सब को बख़्शे हैं दिमाग़ और ले तुझे देते हैं दिल
जोश मलीहाबादी
नज़्म
आख़िरी बोसा
मिरे होंटों पे उस के आख़िरी बोसे की लज़्ज़त सब्त है
वो उस का आख़िरी बोसा
अमजद इस्लाम अमजद
ग़ज़ल
सेहन में इक शोर सा हर आँख है हैरत-ज़दा
चूड़ियाँ सब तोड़ दीं दुल्हन ने पहली रात को
सिब्त अली सबा
ग़ज़ल
वो जिन की दस्त-ख़तें महज़र-ए-सितम पे हैं सब्त
हर उस अदीब हर उस बे-अदब से वाक़िफ़ हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
एक ज़ाती नज़्म
की बीनाई का मसरफ़ था... वो लब दो चार दिन पहले
मिरे माथे पे हो कर सब्त जो कहते थे'' तुम जाओ












