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ग़ज़ल
तसादुम दो निगाहों का भी क्या क्या गुल खिलाता है
समीम-ए-क़ल्ब से फिर इश्क़ का इक़रार होता है
अमानुल्लाह शाद सनाई
ग़ज़ल
सज्दा-रेज़ी में वही आए मज़ा 'सिद्दीक़' फिर
जब समीम-ए-क़ल्ब से मस्जूद की बातें करें
सिद्दीक़ फतहपुरी
ग़ज़ल
जब्बार वासिफ़
ग़ज़ल
अज़्म-ए-समीम ले के निकलता हूँ जब कभी
मंज़िल दिखाई देती है दो-चार गाम से
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
समस्त













