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ग़ज़ल
तसादुम दो निगाहों का भी क्या क्या गुल खिलाता है
समीम-ए-क़ल्ब से फिर इश्क़ का इक़रार होता है
अमानुल्लाह शाद सनाई
ग़ज़ल
सज्दा-रेज़ी में वही आए मज़ा 'सिद्दीक़' फिर
जब समीम-ए-क़ल्ब से मस्जूद की बातें करें
सिद्दीक़ फतहपुरी
ग़ज़ल
जब्बार वासिफ़
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ग़ज़ल
अज़्म-ए-समीम ले के निकलता हूँ जब कभी
मंज़िल दिखाई देती है दो-चार गाम से
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
नज़्म
नेल्सन मंडेला के नाम
ये तिरी जेहद-ए-मुसलसल ये तिरा अज़्म-ए-समीम
शम्अ तूफ़ान-ए-हवादिस में जला दी तू ने
रफ़ीक़ जाबिर
नज़्म
शिकवा
थी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीम
फूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
चाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीम
पहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीम













