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नज़्म
इबलीस की मजलिस-ए-शूरा
फ़ितना-ए-फ़र्दा की हैबत का ये आलम है कि आज
काँपते हैं कोहसार-ओ-मुर्ग़-ज़ार-ओ-जूएबार
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
रात आख़िर हुई और बज़्म हुई ज़ेर-ओ-ज़बर
अब न देखोगे कभी लुत्फ़-ए-शबाना हरगिज़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
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शेर
ये माना इंक़लाब-ए-ज़िंदगी में लाख ख़तरे हैं
तमन्ना फिर भी है ये ज़िंदगी ज़ेर-ओ-ज़बर होती
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
बात करने में जो लब उस के हुए ज़ेर-ओ-ज़बर
एक साअत में तह-ओ-बाला ज़माना हो गया
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ग़ज़ल
इस बेहिस दुनिया के आगे किसी लहर की पेश नहीं जाती
अब बहर का बहर उछाल कोई इसे ज़ेर-ओ-ज़बर करने के लिए
अहमद मुश्ताक़
नज़्म
मर्सिया-ए-देहली-ए-मरहूम
रात आख़िर हुई और बज़्म हुई ज़ेर-ओ-ज़बर
अब न देखोगे कभी लुत्फ़-ए-शबाना हरगिज़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
इंक़लाब-ए-हिन्द
मग़रिब ओ मशरिक़ नज़र आने लगे ज़ेर-ओ-ज़बर
इंक़लाब-ए-हिन्द है सारे जहाँ का इंक़लाब
ज़फ़र अली ख़ाँ
नज़्म
नूर-जहाँ का मज़ार
तावीज़-ए-लहद है ज़बर ओ ज़ेर ये अंधेर
ये दौर-ए-ज़माना के उलट फेर ये अंधेर














