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अनवर ताबाँ

1944 - 2016 | सहारनपुर, भारत

अनवर ताबाँ

ग़ज़ल 16

अशआर 19

ख़ुशी की बात और है ग़मों की बात और

तुम्हारी बात और है हमारी बात और

हँसते हँसते निकल पड़े आँसू

रोते रोते कभी हँसी आई

हर एक शख़्स मिरा शहर में शनासा था

मगर जो ग़ौर से देखा तो मैं अकेला था

जी तो ये चाहता है मर जाएँ

ज़िंदगी अब तिरी रज़ा क्या है

इस ख़ौफ़ में कि खुद भटक जाएँ राह में

भटके हुओं को राह दिखाता नहीं कोई

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