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असलम इमादी

1948

ग़ज़ल 7

शेर 7

हज़ार रास्ते बदले हज़ार स्वाँग रचे

मगर है रक़्स में सर पर इक आसमान वही

तुम मिरे कमरे के अंदर झाँकने आए हो क्यूँ

सो रहा हूँ चैन से हूँ ठीक है सब ठीक है

तुम्हारे दर्द से जागे तो उन की क़द्र खुली

वगरना पहले भी अपने थे जिस्म-ओ-जान वही

हवाएँ शहर की आलूदा-ए-कसाफ़त हैं

ये साफ़-सुथरा-पन और ये नफ़ासतें झूटी

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उन्हें ये फ़िक्र कि दिल को कहाँ छुपा रक्खें

हमें ये शौक़ कि दिल का ख़सारा क्यूँकर हो

पुस्तकें 5

अदबी गुफ्तुगू

 

2007

Agle Mausam Ka Intezar

 

1984

Arsa-e-Khayal

 

2007

Naya Jazeera

 

1974

नया ज़ज़ीरा

 

1974

 

ऑडियो 7

अब रात आ रही है

इंतिज़ार

खोखले बर्तन के होंट

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI