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दानिश अलीगढ़ी

1931 | अलीगढ़, भारत

दानिश अलीगढ़ी

ग़ज़ल 4

 

अशआर 8

ज़र्रे ज़र्रे में महक प्यार की डाली जाए

बू तअस्सुब की हर इक दिल से निकाली जाए

आख़िरी वक़्त तलक साथ अंधेरों ने दिया

रास आते नहीं दुनिया के उजाले मुझ को

मुस्कुरा कर उन का मिलना और बिछड़ना रूठ कर

बस यही दो लफ़्ज़ इक दिन दास्ताँ हो जाएँगे

हो के मजबूर ये बच्चों को सबक़ देना है

अब क़लम छोड़ के तलवार उठा ली जाए

तेरे फ़िराक़ ने की ज़िंदगी अता मुझ को

तेरा विसाल जो मिलता तो मर गया होता

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