ग़ज़ल 11

शेर 7

मैं उस के ऐब उस को बताता भी किस तरह

वो शख़्स आज तक मुझे तन्हा नहीं मिला

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आप आए हैं हाल पूछा है

हम ने ऐसे भी ख़्वाब देखे हैं

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चढ़ते सूरज की मुदारात से पहले 'एजाज़'

सोच लो कितने चराग़ उस ने बुझाए होंगे

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संग-ए-आस्ताँ मिरे सज्दों की लाज रख

आया हूँ ए'तिराफ़-ए-शिकस्त-ए-ख़ुदी लिए

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राह-रौ बच के चल दरख़्तों से

धूप दुश्मन नहीं है साए हैं

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पुस्तकें 2

Gul-e-Sehra

 

1984

Pesh-e-Dasti

 

1975

 

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