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हैदर अली आतिश

1778 - 1847 | लखनऊ, भारत

मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन, 19वीं सदी की उर्दू ग़ज़ल का रौशन सितारा।

मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन, 19वीं सदी की उर्दू ग़ज़ल का रौशन सितारा।

हैदर अली आतिश

ग़ज़ल 98

शेर 92

बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइए

दिल को तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है

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अजब तेरी है महबूब सूरत

नज़र से गिर गए सब ख़ूबसूरत

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सनम जिस ने तुझे चाँद सी सूरत दी है

उसी अल्लाह ने मुझ को भी मोहब्बत दी है

पाक होगा कभी हुस्न इश्क़ का झगड़ा

वो क़िस्सा है ये कि जिस का कोई गवाह नहीं

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सुन तो सही जहाँ में है तेरा फ़साना क्या

कहती है तुझ को ख़ल्क़-ए-ख़ुदा ग़ाएबाना क्या

पुस्तकें 21

Deewan-e-Aatish

 

 

Deewan-e-Khwaja Haidar Ali Aatish

Donon Deewan

1844

Hindustani Adab Ke Memar: Khwaja Haider Ali Atish

 

1989

इंतिख़ाब-ए-आतिश

 

 

Intikhab-e-Atish-o-Ghalib

 

1980

Intikhab-e-Kalam Khwaja Haider Ali Aatish

 

1984

Jazbat-e-Fitrat

Volume-001

 

Khwaja Haidar Ali Atish Husaini Hard-o-Deewan

 

1844

ख़्वाजा हैदर अली आतिश लखनवी

हयात और शायरी

1982

Kulliyat-e-Aatish

Volume-002

1975

चित्र शायरी 2

बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइए दिल को न तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है

 

वीडियो 10

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