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जमाल ओवैसी

1962 | दरभंगा, भारत

प्रमुख उत्तर-आधुनिक शायर

प्रमुख उत्तर-आधुनिक शायर

जमाल ओवैसी

ग़ज़ल 18

अशआर 5

गुरेज़-पा है नया रास्ता किधर जाएँ

चलो कि लौट के हम अपने अपने घर जाएँ

मौत बर-हक़ है एक दिन लेकिन

नींद रातों को ख़ूब आती है

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जो माँग रहे हो वो मिरे बस में नहीं है

दरख़्वास्त तुम्हारी है ज़रूरत से ज़ियादा

घर के सब दरवाज़े क्यूँ दीवार हुए हैं

घर से बाहर दुनिया सारी चीख़ रही है

तन्हाई मिली मुझ को ज़रूरत से ज़ियादा

पढ़ती हैं किताबें मुझे वहशत से ज़ियादा

रुबाई 4

 

पुस्तकें 10

 

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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