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रउफ़ ख़लिश

ग़ज़ल 6

अशआर 12

बिखरते ख़्वाबों से ता'बीर के धुँदलकों तक

मुहाजरत ने कचोके बहुत लगाए हैं

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उतरो ख़ुद अपनी ज़ात की गहराई में 'ख़लिश'

उभरे जो अपने-आप को पाने की आरज़ू

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गुज़रते वक़्त के आसार कौन छोड़ गया

ज़माने टल गए लेकिन अटल रहे हैं सुतून

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ग़म की धूप उतरते ही क्यूँ पिघलने लगती है

याद के घरौंदे में मोम की बनी खिड़की

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जज़्ब कर के रख लेना दस्तकें हथेली में

जब से मैं सफ़र में हूँ हम-सफ़र हैं दरवाज़े

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