ग़ज़ल 14

शेर 2

किसी ने फिर से लगाई सदा उदासी की

पलट के आने लगी है फ़ज़ा उदासी की

ज़मीन-ए-दिल पे मोहब्बत की आब-यारी को

बहुत ही टूट के बरसी घटा उदासी की

 

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