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वक़ार मानवी

1939 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 18

शेर 12

हमारी ज़िंदगी कहने की हद तक ज़िंदगी है बस

ये शीराज़ा भी देखा जाए तो बरहम है बरसों से

बहुत से ग़म छुपे होंगे हँसी में

ज़रा इन हँसने वालों को टटोलो

ग़रीब को हवस-ए-ज़िंदगी नहीं होती

बस इतना है कि वो इज़्ज़त से मरना चाहता है

सलीक़ा बोलने का हो तो बोलो

नहीं तो चुप भली है लब खोलो

कहाँ मिलेगी भला इस सितमगरी की मिसाल

तरस भी खाता है मुझ पर तबाह कर के मुझे

पुस्तकें 7

Aaina-e-Fan-o-Shakhsiyat Mein Waqar Manvi

 

2010

ग़ज़ल के रंग

 

2014

Waqar-e-Agahi

 

1991

वक़ार-ए-आगही

 

1991

Waqar-e-Ghazal

 

2012

Waqar-e-Hunar

 

1998

Waqar-e-Sukhan

 

1978

 

"दिल्ली" के और शायर

  • शैख़  ज़हूरूद्दीन हातिम शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
  • दाग़ देहलवी दाग़ देहलवी
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