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ग़ज़ल
मिस्ल-ए-यूसुफ़ हो रहा हूँ मैं असीर-ए-चाह-ए-ग़म
बोसा ऐ रश्क-ए-ज़ुलेख़ा दो मुझे अबअब के दो
सरदार गंडा सिंह मशरिक़ी
ग़ज़ल
कर दिया अपनी 'अता से रब ने हम को आब-आब
इतना रोए जैसे कोई दाग़-ए-हिर्मां जल गया
अब्दुल्लाह अली एजाज़
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शेर
दिल आबाद कहाँ रह पाए उस की याद भुला देने से
कमरा वीराँ हो जाता है इक तस्वीर हटा देने से
जलील ’आली’
नज़्म
रक़ीब से!
ना-तवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाब
बाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
शिकवा
ऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन ले
ख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन ले














