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ग़ज़ल
मिरा अफ़्साना है मज्ज़ूब की बड़ गर कोई ढूँडे
न ज़ाहिर हो ख़बर उस की न उस का मुब्तदा निकले
रंजूर अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
करते नहीं जफ़ा भी वो तर्क-ए-वफ़ा के साथ
ये कौन सा सितम है दिल-ए-मुब्तला के साथ
अब्दुल रहमान ख़ान वस्फ़ी बहराईची
ग़ज़ल
नाक़िस थी इब्तिदा तो है अंजाम-ए-इश्क़ भी
बे-रब्ती मुब्तदा में जो थी वो ख़बर में है
दत्तात्रिया कैफ़ी
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ग़ज़ल
तिरा रंग सब से जुदा सही तिरी शक्ल सब से हसीं मगर
मिरा मुब्तदा कोई और है मिरा मुंतहा कोई दूसरा
असअ'द बदायुनी
शेर
ख़ुदा मालूम इस आग़ाज़ का अंजाम क्या होगा
छिड़ा है साज़-ए-हस्ती मुब्तदा-ए-बे-ख़बर हो कर
यगाना चंगेज़ी
ग़ज़ल
हम बयाँ करते हैं जुमला की अदम के तरकीब
मुब्तदा उस की तो हस्ती है ख़बर कुछ भी नहीं
आशिक़ हुसैन बज़्म आफंदी
ग़ज़ल
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
मैं अपने साथ जज़्बों की जमाअत ले के आया हूँ
जब इतने मुक़तदी हैं तो इमामत क्यूँ नहीं करते
फ़रहत एहसास
ग़ज़ल
शब-ए-ग़म न पूछ कैसे तिरे मुब्तला पे गुज़री
कभी आह भर के गिरना कभी गिर के आह भरना













