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नज़्म
तुलसीदास
ये अक़ीदा हिंदुओं का है निहायत ही क़दीम
जब कभी मज़हब की हालत होती है ज़ार-ओ-सक़ीम
जगत मोहन लाल रवाँ
ग़ज़ल
बाक़ी है ताब-ए-ज़ब्त न ताक़त फ़ुग़ाँ की है
हालत बहुत सक़ीम दिल-ए-ना-तवाँ की है
मोहम्मद विलायतुल्लाह
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ग़ज़ल
यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो
बशीर बद्र
नज़्म
शिकवा
हम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहे
कहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहे
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
चाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीम
पहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीम
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
सलीम कौसर
ग़ज़ल
मय-कदे में क्या तकल्लुफ़ मय-कशी में क्या हिजाब
बज़्म-ए-साक़ी में अदब आदाब मत देखा करो
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
अमीर ख़ुसरो
ग़ज़ल
मय-कदा सुनसान ख़ुम उल्टे पड़े हैं जाम चूर
सर-निगूँ बैठा है साक़ी जो तिरी महफ़िल में है













