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अलीना इतरत

नोएडा, भारत

मुशायरों में लोकप्रिय, प्रसिद्ध कवयित्री

मुशायरों में लोकप्रिय, प्रसिद्ध कवयित्री

ग़ज़ल 16

नज़्म 4

 

शेर 34

अपनी मुट्ठी में छुपा कर किसी जुगनू की तरह

हम तिरे नाम को चुपके से पढ़ा करते हैं

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ठीक है जाओ तअ'ल्लुक़ रखेंगे हम भी

तुम भी वा'दा करो अब याद नहीं आओगे

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ज़िंदा रहने की ये तरकीब निकाली मैं ने

अपने होने की खबर सब से छुपा ली मैं ने

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चित्र शायरी 3

उदासी शाम तन्हाई कसक यादों की बेचैनी मुझे सब सौंप कर सूरज उतर जाता है पानी में

अपनी मुट्ठी में छुपा कर किसी जुगनू की तरह हम तिरे नाम को चुपके से पढ़ा करते हैं

पुकारते पुकारते सदा ही और हो गई क़ुबूल होते होते हर दुआ ही और हो गई ज़रा सा रुक के दो-घड़ी चमन पे क्या निगाह की बदल गए मिज़ाज-ए-गुल हवा ही और हो गई ये किस के नाम की तपिश से पर पर जल उठे हथेलियाँ महक गईं हिना ही और हो गई ख़िज़ाँ ने अपने नाम की रिदा जो गुल पे डाल दी चमन का रंग उड़ गया सबा ही और हो गई ग़ुरूर-ए-आफ़्ताब से ज़मीं का दिल सहम गया तमाम बारिशें थमीं घटा ही और हो गई ख़मोशियों ने ज़ेर-ए-लब ये क्या कहा ये क्या सुना कि काएनात-ए-इश्क़ की अदा ही और हो गई जो वक़्त मेहरबाँ हुआ तो ख़ार फूल बन गए ख़िज़ाँ की ज़र्द ज़र्द सी क़बा ही और हो गई वरक़ वरक़ 'अलीना' हम ने ज़िंदगी से यूँ रंगा कि कातिब-ए-नसीब की रज़ा ही और हो गई

 

वीडियो 3

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

अलीना इतरत

ख़िज़ाँ की ज़र्द सी रंगत बदल भी सकती है

अलीना इतरत

ज़िंदा रहने की ये तरकीब निकाली मैं ने

अलीना इतरत

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