अज़रा परवीन
ग़ज़ल 8
नज़्म 6
अशआर 5
चार सम्तें आईना सी हर तरफ़
तुम को खो देने का मंज़र और मैं
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ज़मीं के और तक़ाज़े फ़लक कुछ और कहे
क़लम भी चुप है कि अब मोड़ ले कहानी क्या
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उस ने मेरे नाम सूरज चाँद तारे लिख दिया
मेरा दिल मिट्टी पे रख अपने लब रोता रहा
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सिमट गई तो शबनम फूल सितारा थी
बिफर के मेरी लहर लहर अँगारा थी
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रंग अपने जो थे भर भी कहाँ पाए कभी हम
हम ने तो सदा रद्द-ए-अमल में ही बसर की
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ऑडियो 4
अब अपनी चीख़ भी क्या अपनी बे ज़बानी क्या
आसमाँ साहिल समुंदर और मैं
मैं और ही कोई हादिसा हूँ
"लखनऊ" के और शायर
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मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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हया लखनवी
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आग़ा अकबराबादी
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इब्न-ए-रज़ा
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हिज्र नाज़िम अली ख़ान
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सय्यदा फ़रहत
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परवीन शाकिर
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अब्दुर्रहीम नश्तर
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अम्बरीन सलाहुद्दीन
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ज़हीर देहलवी
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साक़िब लखनवी
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शाज़ तमकनत
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निगहत साहिबा
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अख़्तर अली अख़्तर
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अब्दुल हमीद अदम
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प्रो. सईद अहमद
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इशरत आफ़रीं
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क़ैसर-उल जाफ़री
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आफ़ताब इक़बाल शमीम
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अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा